बाराबंकी के दरगाह दरहरा में मनाया गया सालाना उर्स मुबारक: एक आध्यात्मिक संगम

बाराबंकी के दरगाह दरहरा में मनाया गया सालाना उर्स मुबारक: एक आध्यात्मिक संगम

बाराबंकी ज़िले के थाना जहांगीराबाद अंतर्गत ग्राम दरहरा स्थित प्रसिद्ध दरगाह हज़रत उस्मान शहीद शाह रहमतुल्लाह अलैहे का सालाना उर्स मुबारक हर साल की तरह इस बार भी पूरी आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। यह उर्स न सिर्फ़ धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह स्थानीय और दूर-दराज़ से आने वाले जायरीनों के लिए एक भावनात्मक और रूहानी अनुभव भी होता है। इस साल उर्स के आखिरी दिन की रौनक ने सभी को भावविभोर कर दिया। दरगाह उर्स बाराबंकी, हज़रत उस्मान शहीद शाह, और उर्स मुबारक दरहरा जैसे कीवर्ड इस आयोजन को ऑनलाइन खोजने वाले लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। इस पवित्र अवसर पर पूरा इलाका रोशनी और चादरों से सजा हुआ था। धार्मिक अनुशासन, मेले की व्यवस्था और जायरीनों की उपस्थिति ने माहौल को और भी विशेष बना दिया। हर साल की तरह, इस बार भी हजारों की संख्या में लोग उर्स में शरीक हुए और मज़ार शरीफ पर चादरपोशी कर दुआएं मांगीं। यह आयोजन न सिर्फ बाराबंकी की पहचान है, बल्कि पूरे अवध क्षेत्र में इसकी एक अलग ही प्रतिष्ठा है।


कव्वाली की शान: शरीफ परवाज़ और सीबा परवीन ने लूटी महफिल

उर्स मुबारक के अंतिम दिन आयोजित जवाबी कव्वाली का कार्यक्रम पूरे उर्स का सबसे रोचक और भावनात्मक भाग रहा। इस बार की कव्वाली में मंच पर शान बनीं दो दिग्गज कव्वाल—शरीफ परवाज़ और सीबा परवीन। शरीफ परवाज़ ने मां की ममता और उसके बलिदान पर आधारित एक दर्द भरा वाकिया सुनाया, जिसमें उन्होंने बताया कि ऐसी मां होती है जो अपनी औलाद के लिए सब कुछ कुर्बान कर देती है। उनके भावनात्मक अंदाज़ ने श्रोताओं की आंखों को नम कर दिया और माहौल को एक आध्यात्मिक गहराई दे दी। वहीं सीबा परवीन ने मौला अली करमल्लाहु वजहु के शान में एक दिल को छू लेने वाला किस्सा-ए-अली सुनाया, जिसमें “अली मौला अली अली अली” की गूंज ने पूरी फिजा को नूर से भर दिया। शरीफ परवाज कव्वाली, सीबा परवीन कव्वाली, और दरगाह कव्वाली कार्यक्रम

अमन और आध्यात्मिकता का संगम: सलातो सलाम के साथ हुआ समापन

पूरी रात जारी रहे इस रूहानी आयोजन का समापन बड़े अदब और मोहब्बत के साथ सलातो सलाम से किया गया। जायरीनों ने नम आँखों से दुआ मांगी और पूरे भारत में अमन और चैन की फरियाद की। उर्स मुबारक का यह समापन कार्यक्रम उन सभी लोगों के लिए यादगार बन गया जो यहां सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और सुकून की तलाश में आए थे। सलातो सलाम के दौरान दरगाह के चारों ओर हर तरफ सुकून का माहौल था और लोगों ने एक-दूसरे को गले मिलकर मुबारकबाद दी। सलातो सलाम दरगाह, उर्स समापन कार्यक्रम, और दरहरा उर्स मुबारक 2025 जैसे कीवर्ड इस आयोजन की खोज और प्रचार में अहम भूमिका निभाते हैं। दरगाह की नूरानी फिजा में लोगों ने अपने गुनाहों की माफी मांगी और दिलों में सच्चे इरादों से तौबा की।


मेले में दिखी भारी भीड़ और बेहतरीन प्रबंधन

इस साल का दरगाह दरहरा मेला अपने आप में अनुकरणीय रहा। पूरी रात जायरीनों की भारी भीड़ देखी गई, जिसमें महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की बड़ी संख्या में मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि उर्स मुबारक सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। मेला ग्राउंड में हर तरफ रौनक और पाकीज़गी का माहौल था। खाने-पीने के स्टाल, चादरें, इत्र और धार्मिक किताबों की दुकानों से पूरा इलाका जीवंत हो गया था। बाराबंकी मेला दरगाह, दरहरा उर्स भीड़, और सालाना उर्स प्रबंधन जैसे कीवर्डों से इस आयोजन की छवि इंटरनेट पर और बेहतर तरीके से उभारी जा सकती है। प्रशासन द्वारा सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए थे, जिसमें पुलिस के साथ-साथ स्थानीय स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। किसी भी प्रकार की अफरा-तफरी की कोई खबर नहीं आई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह आयोजन पूरी तरह से शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रहा।


प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति ने बढ़ाई शोभा

इस रूहानी कार्यक्रम की शोभा उस समय और भी बढ़ गई जब दरगाह सचिव हकीम मोहम्मद शफीक अंसारी, मेला मीडिया प्रभारी सुहैल अहमद अंसारी, अकील अंसारी, इरफान सब्बीर, और नियाज़ अंसारी जैसे प्रमुख लोग मंच पर उपस्थित रहे। इन सभी ने मेला आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई और जायरीनों की सेवा के लिए हमेशा तत्पर दिखाई दिए। विशेष रूप से सुहैल अहमद अंसारी की मीडिया कवरेज और जनरथ एक्सप्रेस के माध्यम से इस उर्स की खबरों को लोगों तक पहुंचाने की भूमिका सराहनीय रही। जनरथ एक्सप्रेस कवरेज, सुहैल अहमद अंसारी बाराबंकी, और दरगाह प्रमुखों की भूमिका इन सभी ने मिलकर यह साबित किया कि जब इरादे नेक हों और मकसद अल्लाह की रज़ा हासिल करना हो, तो हर काम कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचता है।


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