यूरिया संकट से जूझते किसान: नन्दवल में जान जोखिम में डाल कर खाद की लाइन में खड़े

बहराइच जनपद के फखरपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम सभा नन्दवल में इस समय यूरिया संकट गहराता जा रहा है। किसान अपनी जान की परवाह किए बिना सुबह से ही जर्जर बिल्डिंग में लाइन लगाकर खड़े हैं। सुबह सात बजे से ही सहकारी समिति नन्दवल के बाहर लंबी कतारें देखने को मिलीं, जहां किसान इस उम्मीद में खड़े हैं कि शायद आज उन्हें खरीफ फसल के लिए जरूरी यूरिया मिल जाए। स्थानीय किसान बताते हैं कि पिछले कई दिनों से खाद नहीं मिल पा रही थी, जिसके कारण उनकी फसलें सूखने की कगार पर हैं। सरकार भले ही दावा कर रही हो कि समितियों पर पर्याप्त यूरिया उपलब्ध है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। यह हालात प्रशासन की लापरवाही और वितरण प्रणाली में भारी खामियों को उजागर करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार के दावों और किसानों की समस्याओं में इतनी दूरी क्यों है?


जर्जर इमारत में खाद की लाइन: किसान बोले “जिंदगी से खेलना पड़ रहा है”

नन्दवल ग्राम सभा की सहकारी समिति की जर्जर बिल्डिंग इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। खाद वितरण का कार्य जिस भवन में किया जा रहा है, वह किसी भी वक्त हादसे का शिकार हो सकता है। किसान खुद कह रहे हैं कि हम लोग खाद पाने के लिए जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। बारिश और उमस भरे मौसम में घंटों लाइन में लगना, ऊपर से बिल्डिंग की खस्ता हालत – यह सब मिलाकर किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। कई महिलाओं और बुजुर्ग किसानों ने बताया कि पिछले साल भी इसी जगह हादसा होते-होते बचा था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रशासन कब जागेगा? खाद की कमी और खतरनाक वितरण केंद्र दोनों मिलकर न केवल किसानों की मेहनत को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि उनकी जान भी खतरे में डाल रहे हैं। इस प्रकार की लापरवाही से यह स्पष्ट होता है कि ग्राम पंचायत और विभागीय अफसरों की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाना लाजिमी है।


300 बोरी यूरिया: ऊंट के मुंह में जीरा जैसा वितरण

इस बार समिति को मात्र 300 बोरी यूरिया की पहली खेप प्राप्त हुई है, जो कि ग्राम सभा नन्दवल जैसे बड़े क्षेत्र के लिए “ऊंट के मुंह में जीरा” जैसा है। क्षेत्र में हजारों किसान हैं, जिनकी फसलें यूरिया के बिना अधूरी हैं। एक किसान को औसतन 3–5 बोरी यूरिया की जरूरत होती है, ऐसे में 300 बोरी से मात्र सौ किसान भी कवर नहीं हो पाएंगे। किसानों ने साफ कहा कि “हमें नहीं पता खाद मिलेगी भी या नहीं, लेकिन हम लाइन में लगे हैं क्योंकि विकल्प नहीं है।” इस प्रकार की असमान आपूर्ति नीति ने किसानों में नाराजगी और निराशा भर दी है। यह स्थिति केवल नन्दवल में नहीं, बल्कि पूरे बहराइच जिले में यूरिया वितरण की बदहाली को दर्शाती है। यदि समय रहते उपाय नहीं किए गए, तो खरीफ सीजन में उत्पादन प्रभावित होना तय है। सरकार को चाहिए कि तत्काल यूरिया की दूसरी खेप भेजे और समितियों को पूरी पारदर्शिता से खाद वितरित करने के निर्देश दे।


प्रशासनिक दावों की पोल खोलती नन्दवल की जमीनी हकीकत

सरकार और प्रशासन यह दावा कर रहे हैं कि “राज्य में कहीं भी खाद की कमी नहीं है” लेकिन नन्दवल के हालात इसके ठीक उलट हैं। यहाँ की सहकारी समिति पर न तो समय से खाद पहुंची, न ही उसकी संख्या किसानों की मांग के मुताबिक है। खाद वितरण में लगे अधिकारियों से जब पूछा गया कि क्यों इतनी कम मात्रा में यूरिया आया, तो उन्होंने गोलमोल जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया। किसानों की शिकायत है कि न तो ग्राम प्रधान ने उनकी मदद की और न ही संबंधित कृषि अधिकारी ने कोई सहयोग दिया। इससे स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था किसानों की मेहनत पर भारी पड़ रही है। किसानों को खाद पाने के लिए धूप, गर्मी, बारिश, भूख-प्यास सब कुछ सहना पड़ रहा है, फिर भी नतीजा शून्य निकल रहा है। सरकार को चाहिए कि वह सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली की जांच कराए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।


निष्कर्ष: किसानों की समस्याओं की अनदेखी कब तक?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आज भी किसान खाद और बीज जैसी बुनियादी चीजों के लिए संघर्ष कर रहा है। नन्दवल में किसानों की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की असफलता को उजागर करती हैं। यदि किसान को समय पर खाद, पानी और बीज नहीं मिलेगा, तो वह फसल कैसे उगाएगा? ऐसे में सरकार के तमाम योजनाएं और सब्सिडी केवल दिखावा बनकर रह जाती हैं। इस विषय को मीडिया, सामाजिक संगठनों और जनता को गंभीरता से उठाना चाहिए ताकि यूरिया वितरण व्यवस्था, सहकारी समितियों की पारदर्शिता और किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। किसान देश की रीढ़ है, और अगर वही परेशान रहेगा, तो देश कैसे आगे बढ़ेगा?


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